होऊ शकत है

- धनंजय सोईंदाजी वंजारी

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होऊ शकत है

लोकाभिमुख लोकतंत्र के लिए मान्यवर कांशीराम का बहुजन दर्शन, क्रांति और वैचारिक विरासत

भारत में मुख्यधारा के साहित्य ने मान्यवर कांशीराम के संगठनात्मक और राजनीतिक आंदोलन और विचारो को मुख्यतः, जाति की राजनीति, दलित राजनीति, और सत्ता के लिए अवसरवादी कोशिशों जैसी रूढ़िबद्ध, पूर्वाग्रही या स्टीरियोटाइप धारणाओं से ही, बहुतायत में, जोड़ा। "होऊ शकत है", यह, इन रूढ़िवादी धारणाओं के परे, मान्यवर कांशीराम के बहुजन आंदोलन की वैचारिक पृष्टभूमि प्रस्तुत करने का प्रयास है। यह पहल, उन क्रांतिकारी विचारों और सोच को सामने लाता है जिन्होंने मान्यवर कांशीराम को प्रेरित और आकर्षित किया। इन्हीं विचारों ने, भारत के आधुनिक संवैधानिक ढांचे के भीतर बहुजन आंदोलन को नई जान देने के उनके सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष की वैचारिक नींव रखी। केवल उनकी संगठनात्मक और राजनीतिक योजनाओ पर चर्चा करने की परिधि से आगे बढ़कर, यह पुस्तक, उनके उन विचारों और दार्शनिक बातों को सामने लाती है जिनके आधार पर उन्होंने राजनीति और भारतीय समाज के सामने पारंपरिक और नई चुनौतियों के संदर्भ में बहुजन आंदोलन को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया। उल्लेखनीय है कि इस आंदोलन का मकसद, राजनीतिक लोकतंत्र के मौजूदा ढांचे में पैसे की ताकत, बेलगाम पूंजीवाद, सामंती अवशेषों और ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता व लोकलुभावन सोच जैसी संकीर्ण प्रवृत्तियों के खिलाफ आम लोगों की ताकत को स्थापित करना रहा है। पुस्तक, उन वैचारिक आधारों का विश्लेषण करती है जिनका मकसद भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से शासित वर्गों की स्वतंत्र राजनीति को मजबूत करना था, ताकि भारतीय समाज का भविष्य तय करने में बहुजन समाज की प्रभावी भूमिका हो सके।

          यह अध्ययन, उस सैद्धांतिक आधार को समझने की कोशिश करता है है जिसने ब्रिटिश हुकूमत हुकूमत से आजादी के बाद के भारत के सामाजिक-राजनीतिक सामाजिक- क्षेत्र में मान्यवर कांशीराम की दृढ़ सक्रियता को दिशा दी। साथ ही, यह भारतीय समाज में बहुजन आंदोलन की दार्शनिक दिशा को नई शक्ति देने की मान्यवर कांशीराम की अथक कोशिशों पर एक नई चर्चा पेश करती है, ताकि भारत के मौजूदा लोकतांत्रिक राजनीतिक ढांचे में समानता पर आधारित समाज बनाने के लिए इसे और अधिक प्रासंगिक बनाया जा सके। अहम बात यह है कि यह पुस्तक, समयोचित सन्दर्भ में यह बताने का प्रयास करती है कि कैसे, पारंपरिक रूप से कुलीन वर्ग के नियंत्रण वाली राजनीतिक व्यवस्था और ध्रुवीकरण की बढ़ती प्रवृत्तियों के बीच, मान्यवर कांशीराम की बहुजन विचारधारा, भारत के लिए लोकतांत्रिक अनिवार्यताएँ को प्रभावी बनाती है और ऐतिहासिक रूप से शासित आम लोगों की प्रभावशाली हिस्सेदारी और जन-लोकतंत्र को सुनिश्चित करने का वादा करती है।

उत्पादन तपशील (Product Specifications)

तपशील

माहिती

पुस्तकाचे नाव

होऊ शकत है — लोकाभिमुख लोकतंत्र के लिए मान्यवर कांशीराम का बहुजन दर्शन

विषय

मान्यवर कांशीराम यांचे विचार / बहुजन चळवळ व राजकीय तत्त्वज्ञान

भाषा

marathi

बांधणी (Binding)

Hardcover

वजन (Weight)

0.600 किग्रॅ (600g)

एकूण पृष्ठे (Pages)

400 पाने